स्त्री एक विषय नहीं, एक अनंत पाठ है स्त्री, सत्ता, राजनीति, धर्म और सामाजिक संरचनाओं का संघर्ष एवं संवाद लेखक अमित श्रीवास्तव

प्रस्तावना: चेतना का सत्ता से टकराव और उसका अनंत विस्तार
पिछले दो भागों में हमने स्त्री चेतना की गहराइयों को छुआ—धर्म-दर्शन की किताबों से शुरू होकर मनोविज्ञान, प्रेम, देह, यौनिकता, मौन, क्रोध और चक्रीय समय तक। हमने देखा कि पुरुष चेतना ने स्त्री को बार-बार 'ऑब्जेक्ट' बनाने की कोशिश की—कभी देवी बनाकर पूजकर दूर रखा, कभी भूमिकाओं में बांधकर नियंत्रित किया, कभी रहस्य कहकर समझने से इनकार किया। लेकिन स्त्री कोई किताब नहीं, जो पढ़कर बंद हो जाए; वह नदी है, जो बहती रहती है, बदलती रहती है, और हर मोड़ पर नया अर्थ रचती है। 


अब तीसरे भाग में हम उस स्तर पर पहुंचते हैं जहां स्त्री चेतना व्यक्तिगत या आध्यात्मिक सीमाओं से बाहर निकलकर सामूहिक सत्ता की संरचनाओं से सीधे टकराती है। यहां सवाल केवल यह नहीं कि स्त्री राजनीति में है या नहीं, बल्कि जब स्त्री सत्ता की कुर्सी पर बैठती है, भाषा बोलती है, निर्णय लेती है, तो पूरी संरचना—राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक—कैसे हिलती है, कैसे प्रतिरोध करती है, और कैसे अंततः बदलती है। 
भारतीय संदर्भ में यह संघर्ष विशेष रूप से जटिल है। यहां धर्म स्त्री को 'शक्ति' कहता है, लेकिन मानवीय स्त्री को प्रश्न करने या स्वतंत्र निर्णय लेने से रोकता है। राजनीति में स्त्री नेता आती हैं, लेकिन अक्सर पुरुष-शैली में सत्ता चलाती हैं या 'महिला मुद्दों' तक सीमित कर दी जाती हैं। सामाजिक संरचनाएं—परिवार, जाति, विवाह—स्त्री को सबसे गहरे स्तर पर बांधती हैं। लेकिन स्त्री चेतना इन सबके बीच से निकलकर न केवल पीड़िता बनकर रह जाती है—वह परिवर्तन की धुरी बनती है, नए विचारों की जननी बनती है, और भविष्य की संरचयिता बनकर उभरती है। 
यह भाग विस्तार से देखेगा वैदिक-भक्ति काल की स्वतंत्रता से लेकर आधुनिक राजनीतिक नेतृत्व तक, धर्म की व्याख्याओं से लेकर सामाजिक आंदोलनों तक। हम ऐतिहासिक उदाहरणों, प्रमुख महिला नेताओं के जीवन, चुनौतियों, उपलब्धियों और भविष्य की संभावनाओं को गहराई से विश्लेषित करेंगे। 
1. धर्म में स्त्री: पूजा की मूर्ति से प्रश्न करने वाली आवाज तक
भारतीय धर्म में स्त्री की स्थिति द्वंद्वपूर्ण रही है। एक ओर वेदों में 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता'—जहां नारी पूजित होती है, वहां देवता निवास करते हैं। लेकिन यह पूजा अक्सर प्रतीकात्मक रही—देवी दुर्गा, काली, लक्ष्मी को मंदिर में स्थापित कर दिया जाता है, लेकिन जीवित स्त्री से संवाद नहीं किया जाता। पुराणों और स्मृतियों में स्त्री को 'रक्षक' की जरूरत बताई गई: पिता रक्षति कौमारे, भर्ता रक्षति यौवने, पुत्र रक्षति वार्धक्ये—स्त्री कभी स्वतंत्र नहीं। 
यह पुरुष-केंद्रित व्याख्या रही। लेकिन धर्म के भीतर ही प्रतिरोध के बीज बोए गए। भक्ति आंदोलन (मध्यकाल से) ने स्त्री को सबसे बड़ा मंच दिया। 
- आंडाल (8वीं शताब्दी, तमिलनाडु): विष्णु से प्रेम में डूबी, सामाजिक मर्यादाओं को तोड़कर भक्ति गीत रचे। उनका प्रेम धार्मिक था, लेकिन उसने पितृसत्ता को चुनौती दी। 
- मीरा (16वीं शताब्दी): "म्हारो प्रभु गिरधर नागर, और न कोई"—पति, कुल, समाज सब छोड़कर कृष्ण-प्रेम चुना। यह केवल आध्यात्मिक नहीं, राजनीतिक विद्रोह था—धर्म के नाम पर सत्ता को अस्वीकार करना। 
- अक्का महादेवी (12वीं शताब्दी, कर्नाटक): वस्त्र त्यागकर नग्न भक्ति में डूबी, पति और राजा की सत्ता से मुक्त हुई। 
- लल्लेश्वरी (14वीं शताब्दी, कश्मीर): "शिव छुय थल थल" (शिव हर जगह है)—जाति-लिंग से ऊपर उठकर आत्मा की खोज की। 
ये स्त्रियां धर्म को पुनर्व्याख्या करती हैं—पूजा नहीं, संवाद और मुक्ति की मांग करती हैं। 
आधुनिक समय में धर्म राजनीति का हथियार बन गया। हिंदुत्व की राजनीति में 'मातृशक्ति' या 'स्त्री सुरक्षा' का नारा दिया जाता है, लेकिन यह अक्सर स्त्री की स्वायत्तता को सीमित करता है। उदाहरण: राम मंदिर आंदोलन में महिलाओं की भूमिका प्रतीकात्मक रही, उनकी आवाज दबी। ट्रिपल तलाक कानून (2019) ने मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिया, लेकिन इसे राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया। 
फिर भी, स्त्री संगठन धर्म को चुनौती देते हैं। 'गुलाब गैंग' (उत्तर प्रदेश) ने घरेलू हिंसा और भ्रष्टाचार के खिलाफ लाठी लेकर विरोध किया। 'पिंक चड्डी कैंपेन' (2009) ने संस्कृति के नाम पर हिंसा का विरोध किया। ये आंदोलन धर्म को पुनर्परिभाषित करते हैं—शक्ति केवल मंदिर में नहीं, सड़क पर भी है। 
2. राजनीति में स्त्री: सत्ता तक पहुंच, लेकिन संरचना का परिवर्तन?
भारत में स्त्री राजनीतिक सत्ता तक पहुंची है, लेकिन चुनौतियां गहरी हैं। 
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
स्वतंत्रता संग्राम में स्त्री सक्रिय थी: सरोजिनी नायडू (कांग्रेस अध्यक्ष 1925), अरुणा आसफ अली (भारत छोड़ो आंदोलन), सुचेता कृपलानी (उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री 1963)। 
प्रमुख महिला नेता और उनका योगदान 
- इंदिरा गांधी (प्रधानमंत्री 1966-77, 1980-84): भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री। 'गरीबी हटाओ', बांग्लादेश मुक्ति संग्राम, आपातकाल—उनके फैसले मजबूत थे, लेकिन अक्सर पुरुष-शैली के। उनकी सत्ता ने स्त्री को उच्च पद पर स्थापित किया, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर पितृसत्ता को चुनौती नहीं दी। 
- प्रतिभा पाटिल (राष्ट्रपति 2007-12): पहली महिला राष्ट्रपति। 
- सुषमा स्वराज (विदेश मंत्री): विदेश नीति में मजबूत छवि, लेकिन स्वास्थ्य और राजनीतिक दबावों से जूझीं। 
- ममता बनर्जी (पश्चिम बंगाल मुख्यमंत्री 2011 से): 'दीदी' के नाम से जानी जातीं। तृणमूल कांग्रेस बनाकर सीपीएम को हराया। किसान आंदोलन (सिंगूर, नंदीग्राम) में महिलाओं की भूमिका प्रमुख। 
- मायावती (उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री चार बार): बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख। दलित-स्त्री पहचान को केंद्र में रखा। 'आइरन लेडी' कहलातीं। 
- जयललिता (तमिलनाडु मुख्यमंत्री कई बार): एआईएडीएमके की नेता। 'अम्मा' की छवि। 
- निर्मला सीतारमण (वित्त मंत्री): पहली पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री, कई बजट पेश किए। 
चुनौतियां 
- कम प्रतिनिधित्व: लोकसभा में महिलाएं ~14-15%, राज्य विधानसभाओं में कम। 
- पितृसत्तात्मक दलों की संरचना: टिकट पुरुष-प्रधान, महिलाओं को 'सुरक्षित' सीटें मिलती हैं। 
- प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व: पंचायतों में 33% आरक्षण से महिलाएं सरपंच बनीं, लेकिन अक्सर पति/परिवार नियंत्रित करते हैं। 
- हिंसा और असुरक्षा: राजनीतिक हिंसा, चरित्र हनन, बलात्कार की धमकियां। 
- कार्यबल भागीदारी: शिक्षा बढ़ी, लेकिन राजनीति में आर्थिक स्वतंत्रता कम। 
महिला आरक्षण विधेयक (2023) 
नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वां संशोधन) ने लोकसभा और विधानसभाओं में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कीं। लेकिन कार्यान्वयन 2029 के बाद (जनगणना और परिसीमन के बाद)। चुनौतियां: परिसीमन में देरी, ओबीसी-एससी-एसटी महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग, प्रॉक्सी का खतरा। 
फिर भी, यह ऐतिहासिक कदम है—स्थानीय स्तर पर पंचायत आरक्षण से महिलाओं ने विकास कार्य बेहतर किए (कम भ्रष्टाचार, अधिक सेवाएं)। 
3. सामाजिक संरचनाएं: परिवार, जाति, विवाह और स्त्री का गहरा संघर्ष
परिवार और विवाह
स्त्री से 'समायोजन', 'त्याग', 'पतिव्रता' की अपेक्षा। लिव-इन, देर से विवाह, तलाक बढ़े—स्त्री स्वायत्तता के संकेत। लेकिन 'परिवार की इज्जत' के नाम पर दबाव। 
जाति और स्त्री
दलित-आदिवासी स्त्रियां दोहरी हिंसा झेलती हैं। दलित फेमिनिज्म ने जाति को फेमिनिज्म में शामिल किया। 
- सावित्रीबाई फुले: पहली महिला शिक्षिका, दलित-स्त्री शिक्षा की शुरुआत। 
- राष्ट्रीय दलित महिला फेडरेशन (1995): जाति-लिंग-वर्ग के चौराहे पर संघर्ष। 
- लेखिकाएं: बामा, उर्मिला पवार—दलित स्त्री की आवाज। 
आदिवासी स्त्रियां: भूमि अधिकार, वन अधिकार, बलात्कार के खिलाफ संघर्ष। 
4. स्त्री आंदोलन: पीड़िता से परिवर्तन की जननी तक
भारतीय स्त्री आंदोलन तीन लहरों में: 
- पहली लहर (19वीं सदी): सती-प्रथा, बाल विवाह विरोध। 
- दूसरी लहर (स्वतंत्रता संग्राम): गांधी के साथ भागीदारी। 
- तीसरी लहर (1970 से): #MeToo, निर्भया (2012), शाहबानो (1985), ट्रिपल तलाक। 
दलित-आदिवासी फेमिनिज्म ने मुख्यधारा फेमिनिज्म को जाति सिखाई। आज स्त्री केवल अधिकार नहीं मांगती—नई राजनीति, नया परिवार, नया धर्म रच रही है। 
लेखक का निर्णायक निष्कर्ष 
स्त्री एक अनंत पाठ है—जो सत्ता की हर किताब को पढ़ता, फाड़ता और फिर से लिखता है। पुरुष चेतना जब तक इस अनंतता को स्वीकार नहीं करेगी, तब तक स्त्री को समझने का दावा करती रहेगी, लेकिन 33% पासिंग मार्क्स से आगे नहीं बढ़ पाएगी। 
यह पाठ कभी खत्म नहीं होता। यह संघर्ष का, संवाद का, और सृष्टि को नए सिरे से रचने का आमंत्रण है। अगले भाग में हम डिजिटल युग, वैश्विक संदर्भ और स्त्री चेतना के भविष्य में जाएंगे—जहां स्त्री न केवल भारत की, बल्कि पूरी मानवता की धुरी बनेगी।


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