पिछले पचास वर्षों का भारतीय नेतृत्व: विचारहीन राजनीति और भविष्यहीन दृष्टि का संकट

सत्य, निर्भीकता, गहन चिंतन और राष्ट्र-हित की भावना से ओत-प्रोत संपादकीय लेख। जब हम स्वतंत्र भारत के पिछले पचास वर्षों (लगभग 1975 से 2025 तक) की राजनीतिक यात्रा पर दृष्टि डालते हैं, तो मन में एक ही प्रश्न उभरता है – क्या यह वही भारत है जिसके लिए लाखों स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने प्राण न्योछावर किए थे? क्या यह वही लोकतंत्र है जिसे हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहकर गर्व से छाती ठोकते हैं? सत्य यह है कि आज का भारतीय राजनीतिक नेतृत्व विचारों की उस ऊँचाई से बहुत दूर चला गया है, जहाँ कभी नेहरू, पटेल, राजेंद्र प्रसाद, आचार्य कृपलानी और जयप्रकाश नारायण जैसे महानुभाव खड़े थे। आज राजनीति विचार से विवाद, नीति से नारा, और राष्ट्र-दृष्टि से व्यक्तिगत सत्ता-लोलुपता में बदल चुकी है। यह संकट इतना गहरा है कि यदि हमने अब भी आत्ममंथन नहीं किया, तो यह लोकतंत्र केवल औपचारिक कवच बनकर रह जाएगा – जिसमें जनता मत देती रहेगी, लेकिन देश की दिशा कोई तय नहीं कर पाएगा।

विचारों का पतन: 1970 के दशक से शुरू हुई गिरावट

1970 के दशक तक भारतीय राजनीति में वैचारिक बहसें जीवंत थीं। संसद में आर्थिक मॉडल, समाजवाद बनाम पूँजीवाद, विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता, शिक्षा का ढाँचा, भूमि सुधार – इन सब पर गंभीर, तर्कपूर्ण चर्चाएँ होती थीं। नेता किताबें लिखते थे, लेख प्रकाशित करते थे, और असहमति को भी बौद्धिक स्तर पर सम्मान देते थे। इंदिरा गांधी के समय आपातकाल 1975-77 ने इस प्रक्रिया को पहला गहरा आघात पहुँचाया। आपातकाल के बाद जो राजनीति उभरी, वह वैचारिक नहीं, बल्कि बदला लेने वाली और व्यक्तिगत हुई। जनता पार्टी का गठन हुआ, लेकिन वह विचारों से नहीं, इंदिरा-विरोध से चली। 1980 में इंदिरा की वापसी, फिर राजीव गांधी का युग – इनमें भी नीति की जगह टेक्नोक्रेटिक दृष्टिकोण और परिवारवाद हावी हो गया।
1989-90 के संयुक्त मोर्चा सरकारों के समय मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हुईं। यह एक ऐतिहासिक कदम था, लेकिन इसे विचार-आधारित सामाजिक न्याय की बजाय वोट-बैंक की राजनीति में बदल दिया गया। राम मंदिर आंदोलन ने 1990 के दशक में धार्मिक-भावनात्मक राजनीति को जन्म दिया। 1990 से 2014 तक यूपीए-एनडीए के गठबंधन युग में राजनीति पूरी तरह चुनावी गणित पर आ गई। गठबंधन की मजबूरी में नीतियाँ समझौतों का परिणाम बन गईं, न कि किसी दूरगामी दृष्टि का। 2014 के बाद भाजपा की एकछत्र सत्ता ने इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया। आज संसद बहस का स्थान नहीं, बल्कि नारे लगाने और विरोध-प्रदर्शन का अखाड़ा बन चुकी है।


अतीत-पूजा और औपनिवेशिक दोषारोपण: वर्तमान से पलायन का आसान रास्ता

भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह दो छोरों पर लटकी हुई है – एक ओर प्राचीन भारत का अतिरंजित गौरव, दूसरी ओर हर समस्या के लिए मुगल साम्राज्य, अंग्रेजी हुकूमत, नेहरू गांधी को दोष देना। एक तरफ दावा किया जाता है कि प्राचीन भारत में विमान थे, प्लास्टिक सर्जरी थी, परमाणु ज्ञान था – जबकि वर्तमान में हम चीन से तकनीकी आयात करते हैं, अमेरिका से रक्षा सामग्री माँगते हैं। दूसरी तरफ हर आर्थिक असफलता, बेरोजगारी, गरीबी के लिए 200 साल के ब्रिटिश शासन को जिम्मेदार ठहराया जाता है। दोनों ही प्रवृत्तियाँ एक ही बात छिपाती हैं – वर्तमान नेतृत्व की अक्षमता और दृष्टिहीनता।

पिछले 50 वर्षों में भारत ने आईआईटी, आईआईएम, अंतरिक्ष कार्यक्रम, परमाणु परीक्षण, आर्थिक उदारीकरण जैसे कई मील के पत्थर छुए हैं। लेकिन इन उपलब्धियों को कोई राष्ट्रीय दृष्टि से नहीं जोड़ा गया। ये अलग-अलग सरकारों की अलग-अलग उपलब्धियाँ बनकर रह गईं। युवा पीढ़ी आज बेहतर शिक्षा, नौकरी, स्वास्थ्य के लिए विदेश भाग रही है। 2025 तक अनुमान है कि भारत से 10 लाख से अधिक प्रतिभाशाली हर साल विदेश जा रहे हैं। क्या यह राष्ट्रभक्ति है? नहीं, यह नेतृत्व की विफलता है। अतीत का गौरव गिनाना आसान है, लेकिन भविष्य की योजना बनाना कठिन।

चुनावीकरण की कैद: नैतिक शून्यता का युग
आज की राजनीति 24×7 चुनावी मोड में जी रही है। हर बयान, हर नीति, हर फैसला वोट बैंक को ध्यान में रखकर लिया जाता है। झूठे वादे, अतिरंजित आरोप, भावनात्मक मुद्दों का दोहन, विरोधी को राष्ट्र-विरोधी सिद्ध करना – ये सामान्य हो गए हैं। नेता अब पुस्तकें नहीं लिखते, विचार-दस्तावेज नहीं प्रस्तुत करते। उनकी पहचान सेल्फी, ट्रोल आर्मी, सोशल मीडिया ट्रेंड और वायरल वीडियो से होती है।

पिछले 50 वर्षों में हमने देखा है कि कैसे कांग्रेस ने परिवारवाद को संस्थागत बनाया, भाजपा ने धार्मिक-राष्ट्रीयता को हथियार बनाया, क्षेत्रीय दल जाति-आधारित राजनीति पर टिके रहे। लेकिन किसी ने भी दीर्घकालिक राष्ट्रीय दृष्टि नहीं दी। 1991 का उदारीकरण आर्थिक संकट से मजबूरी में आया, न कि किसी दूरदर्शी योजना से। जीएसटी, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया जैसे कदम अच्छे हैं, लेकिन इन्हें विचारधारा से नहीं जोड़ा गया। ये भी चुनावी लाभ के लिए प्रचारित होते हैं।

शासन बनाम सत्ता: जिम्मेदारी का लोप
शासन का अर्थ है जिम्मेदारी, उत्तरदायित्व और आत्मसंयम। लेकिन आज सत्ता ही सफलता का पैमाना बन गई है। पद पर बने रहना कर्तव्य से ऊपर हो गया। विफलताओं की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता। मंत्रियों की कुर्सी बचाने के लिए नीतियाँ बदली जाती हैं। विपक्ष भी सत्ता में आने के लिए कुछ भी करने को तैयार।

औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश प्रशासन में कम से कम संस्थागत अनुशासन था – दीर्घकालिक योजना, नियम-कानून। स्वतंत्र भारत ने इसे सुधारने की बजाय और खराब किया। आज नौकरशाही राजनीतिक दबाव में काम करती है, न्यायपालिका पर दबाव, मीडिया पर नियंत्रण – सब कुछ सत्ता बचाने के लिए।

लोकतंत्र का भविष्य: आत्ममंथन की घड़ी
आज भारत को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो चुनाव से आगे सोचे। जो नीति को नारे से ऊपर रखे। जो राष्ट्रहित को पार्टीहित से बड़ा माने। संसद को फिर से विचारों का मंच बनाना होगा। युवाओं को राजनीति में लाना होगा, न कि केवल वोट बैंक समझना।
यदि हम यही करते रहे – विचारहीन, प्रतिक्रियात्मक, अवसरवादी राजनीति – तो लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित रह जाएगा। सच्चा लोकतंत्र दूरदर्शी नेतृत्व, जागरूक नागरिक और जिम्मेदार संस्थाओं से बनता है।

कर्म-धर्म की पुकार— पिछले पचास वर्षों की यह यात्रा हमें सिखाती है कि स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि निरंतर बौद्धिक, नैतिक और संस्थागत परिश्रम है। यदि नेतृत्व में दृष्टि नहीं होगी, तो देश अतीत के गौरव और आरोप-प्रत्यारोप के बीच भटकता रहेगा। अब समय है कि राजनीति फिर से विचार, नीति और भविष्य की ओर लौटे। यही सच्ची राष्ट्रसेवा है। यही कर्म है, यही धर्म है। जय हिंद। जय भारत।

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