यौन शिक्षा के वैश्विक मॉडल एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं गहन विश्लेषणात्मक अध्ययन
यौन शिक्षा (Sexuality Education) आज के वैश्विक संदर्भ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण, बहुआयामी और अत्यधिक संवेदनशील विषय बन चुका है, जो केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक समानता, लिंग न्याय, मानवाधिकार, किशोरों की भावनात्मक परिपक्वता, परिवार नियोजन, यौन संचारित संक्रमणों (STI) एवं HIV की रोकथाम, अनचाहे गर्भधारण से सुरक्षा, लिंग आधारित हिंसा की समाप्ति, युवाओं में जिम्मेदार निर्णय लेने की क्षमता का विकास तथा संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित सतत विकास लक्ष्यों (Sustainable Development Goals - SDGs) के कई पहलुओं जैसे स्वास्थ्य (SDG 3), गुणवत्तापूर्ण शिक्षा (SDG 4), लिंग समानता (SDG 5) एवं युवा सशक्तिकरण से गहराई से जुड़ा हुआ है। विभिन्न देशों, क्षेत्रों तथा अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने यौन शिक्षा के लिए अलग-अलग दृष्टिकोण, नीतियां एवं कार्यान्वयन मॉडल विकसित किए हैं, जिन्हें मुख्य रूप से दो बड़े वर्गों में विभाजित किया जा सकता है।
पहला है व्यापक यौन शिक्षा (Comprehensive Sexuality Education - CSE), जो वैज्ञानिक प्रमाणों, मानवाधिकारों, लिंग समानता, आयु-अनुरूपता, सकारात्मक दृष्टिकोण एवं समग्र कल्याण पर आधारित होती है।
तथा दूसरा है संयम-केंद्रित या अभिनय-केवल शिक्षा (Abstinence-based या Abstinence-only Education), जो मुख्यतः विवाह तक संयम (abstinence) पर जोर देती है तथा अक्सर गर्भनिरोधक, यौन व्यवहार, यौन विविधता या सुरक्षित यौन संबंधों की जानकारी को या तो सीमित रखती है, नजरअंदाज करती है या नकारात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है। इन मॉडलों की तुलना, प्रभावशीलता, सामाजिक-संस्कृति अनुकूलन एवं परिणामों का गहन अध्ययन करने से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि व्यापक एवं सकारात्मक दृष्टिकोण वाले मॉडल वाले देशों एवं क्षेत्रों में किशोर स्वास्थ्य संकेतक — जैसे किशोर गर्भधारण दर (adolescent pregnancy rate), यौन संचारित संक्रमणों की प्रसार दर, लिंग आधारित हिंसा की घटनाएं तथा युवाओं में भावनात्मक एवं यौन स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता — विश्व स्तर पर सबसे बेहतर पाए जाते हैं, जबकि संयम-केंद्रित मॉडल वाले देशों या क्षेत्रों में ये संकेतक अपेक्षाकृत कमजोर एवं चिंताजनक स्तर पर बने रहते हैं।
संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न प्रमुख एजेंसियां — विशेषकर UNESCO (United Nations Educational, Scientific and Cultural Organization), WHO (World Health Organization), UNFPA (United Nations Population Fund), UNICEF, UNAIDS तथा UN Women — ने मिलकर 2018 में International Technical Guidance on Sexuality Education: An evidence-informed approach नामक एक ऐतिहासिक एवं सर्वाधिक मान्यता प्राप्त दस्तावेज़ जारी किया, जो आज भी (2025-2026 तक) वैश्विक स्तर पर सबसे प्रमाण-आधारित, वैज्ञानिक रूप से सुदृढ़ एवं व्यापक रूप से अपनाया जाने वाला फ्रेमवर्क बना हुआ है। यह दस्तावेज़ 2009 के मूल संस्करण का गहन संशोधित एवं अपडेटेड रूप है, जिसमें 8 प्रमुख अवधारणात्मक क्षेत्र (Key Concepts) को अत्यंत व्यवस्थित, क्रमबद्ध (sequenced) एवं आयु-उपयुक्त (age-appropriate) ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जो 5 वर्ष की आयु से लेकर 18+ वर्ष तक के युवाओं के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। इन आठ क्षेत्रों में शामिल हैं - रिश्ते (Relationships) जिसमें परिवार, मित्रता, रोमांटिक संबंध, विवाह, सहमति, सम्मान एवं भावनात्मक बंधन जैसे विषय आते हैं - मूल्य, अधिकार, संस्कृति एवं यौनता (Values, Rights, Culture and Sexuality) जिसमें मानवाधिकार, लिंग समानता, सांस्कृतिक विविधता एवं नैतिकता शामिल है - लिंग (Gender) जिसमें लिंग भूमिकाएं, समानता, लिंग आधारित हिंसा एवं लिंग विविधता (gender diversity) पर चर्चा होती है - हिंसा एवं सुरक्षा (Violence and Staying Safe) जिसमें यौन शोषण, ऑनलाइन सुरक्षा, सहमति एवं व्यक्तिगत सुरक्षा के उपाय शामिल हैं - स्वास्थ्य के लिए कौशल (Skills for Health and Well-being) जिसमें निर्णय लेना, संवाद कौशल, भावनात्मक प्रबंधन एवं तनाव नियंत्रण जैसे जीवन कौशल सिखाए जाते हैं - मानव शरीर एवं विकास (Human Body and Development) जिसमें यौवन, मासिक धर्म, शारीरिक परिवर्तन एवं प्रजनन प्रक्रिया की वैज्ञानिक जानकारी दी जाती है - यौनता एवं यौन व्यवहार (Sexuality and Sexual Behaviour) जिसमें यौन आकर्षण, व्यवहार, सीमाएं एवं जिम्मेदारी शामिल है तथा यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य (Sexual and Reproductive Health) जिसमें गर्भनिरोधक, गर्भावस्था, STI/HIV रोकथाम, सुरक्षित गर्भपात एवं स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच जैसे विषय आते हैं। इस फ्रेमवर्क की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह यौनता को नकारात्मक, जोखिमपूर्ण या शर्मनाक विषय के रूप में नहीं, बल्कि एक सकारात्मक, पुष्टि करने वाली (affirming), सामान्य एवं मानव जीवन के अभिन्न अंग के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसमें सम्मान, सहमति, भावनात्मक स्वास्थ्य, लिंग विविधता, मानवाधिकार एवं जिम्मेदार निर्णय लेने की क्षमता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। यह मॉडल न केवल वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित है, बल्कि सांस्कृतिक संवेदनशीलता, लिंग समानता, युवाओं के सर्वोत्तम हित एवं सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के साथ पूर्ण रूप से संरेखित है, जिसके कारण इसे 85% से अधिक देशों ने अपनी नीतियों में कम से कम आंशिक रूप से शामिल किया है।
उत्तर-पश्चिमी यूरोपीय देशों में लागू नीदरलैंड्स मॉडल (Dutch Model) को वैश्विक स्तर पर सबसे सफल, प्रभावी एवं अनुकरणीय मॉडल माना जाता है, जिसकी सफलता का आधार इसकी अत्यंत प्रारंभिक शुरुआत, सकारात्मक दृष्टिकोण एवं समग्र कार्यान्वयन है। नीदरलैंड्स में यौन शिक्षा 4-5 वर्ष की आयु से ही अनिवार्य रूप से शुरू हो जाती है तथा यह पूरे स्कूली जीवन में निरंतर चलती रहती है। इस मॉडल की मुख्य विशेषता यह है कि यह यौनता को किसी डर, शर्म या केवल जोखिम से जुड़ी समस्या के रूप में नहीं देखता, बल्कि इसे एक सामान्य, सकारात्मक, सम्मानजनक एवं जीवन का स्वाभाविक हिस्सा मानता है। प्रारंभिक चरण (4-8 वर्ष) में बच्चों को "अच्छा स्पर्श-बुरा स्पर्श", शरीर की निजता (privacy), शरीर के अंगों के सही नाम, सम्मान एवं सीमाएं जैसे बुनियादी एवं अत्यंत महत्वपूर्ण विषय सिखाए जाते हैं, जबकि किशोरावस्था (12-18 वर्ष) में सहमति (consent), भावनात्मक बंधन, स्वस्थ रिश्ते, गर्भनिरोधक विधियां, यौन संचारित संक्रमणों से सुरक्षा, लिंग विविधता (LGBTQ+ inclusion), ऑनलाइन सुरक्षा, यौन सुख (sexual pleasure) एवं जिम्मेदार निर्णय जैसे विषयों पर खुला, वैज्ञानिक एवं सम्मानजनक संवाद किया जाता है। प्रसिद्ध कार्यक्रम जैसे "Spring Fever" (प्राथमिक स्तर) एवं "Long Live Love" (माध्यमिक स्तर) के माध्यम से यह शिक्षा दी जाती है, जिसमें शिक्षक विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं, माता-पिता को सक्रिय रूप से शामिल किया जाता है तथा पाठ्यक्रम में सांस्कृतिक संवेदनशीलता एवं युवाओं की वास्तविक जीवन स्थितियों को ध्यान में रखा जाता है। परिणामस्वरूप, नीदरलैंड्स में किशोर गर्भधारण दर विश्व में सबसे कम (5-6 प्रति 1000 लड़कियां) है, यौन संचारित संक्रमणों की दर अत्यंत निम्न है तथा युवाओं में यौन स्वास्थ्य एवं संबंधों के प्रति सकारात्मक, जिम्मेदार एवं सम्मानपूर्ण दृष्टिकोण विकसित होता है, जो इस मॉडल की वैश्विक सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
इसी प्रकार, स्कैंडिनेवियाई मॉडल (Nordic Model) भी अत्यंत सफल एवं लंबे समय से चला आ रहा मॉडल है, जिसमें स्वीडन का उदाहरण सबसे प्रमुख है। स्वीडन में यौन शिक्षा 1955 से ही अनिवार्य है तथा 6-7 वर्ष की आयु से शुरू होकर पूरे स्कूली जीवन में निरंतर चलती रहती है। इस मॉडल की मुख्य ताकत लिंग समानता (gender equality), सम्मान, विविधता, भावनात्मक स्वास्थ्य, जिम्मेदार रिश्ते एवं नैतिक मूल्यों पर अत्यंत गहन जोर है। स्वीडन में यौन शिक्षा को "केवल जानकारी प्रदान करना" नहीं, बल्कि "मूल्यों, कौशलों एवं जिम्मेदार व्यवहार का विकास" माना जाता है, जिससे युवा न केवल शारीरिक रूप से सुरक्षित रहते हैं, बल्कि भावनात्मक रूप से भी मजबूत एवं परिपक्व बनते हैं। इसी प्रकार, डेनमार्क एवं नॉर्वे जैसे देशों में भी यौन शिक्षा अत्यंत प्रगतिशील है, जहां सहमति, लिंग विविधता, ऑनलाइन सुरक्षा एवं संबंधों की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। परिणामस्वरूप, इन देशों में किशोर गर्भावस्था दर 4-5 प्रति 1000 के आसपास है, जो वैश्विक औसत से कई गुना कम है तथा युवाओं में यौन स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता एवं सम्मानजनक व्यवहार का स्तर अत्यंत उच्च है।
दूसरी ओर, संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में यौन शिक्षा का मॉडल अत्यंत विभाजित (polarized) एवं असमान है, क्योंकि वहाँ कोई एकरूप राष्ट्रीय नीति नहीं है तथा यह पूरी तरह राज्य स्तर पर निर्भर करता है। लगभग 30 से अधिक राज्यों में अभिनय-केवल-तक-विवाह (Abstinence-only-until-marriage) मॉडल लागू होता है, जिसमें मुख्य जोर केवल विवाह तक संयम पर होता है तथा गर्भनिरोधक, यौन व्यवहार, यौन विविधता या सुरक्षित यौन संबंधों की जानकारी को या तो नजरअंदाज किया जाता है या नकारात्मक रूप से प्रस्तुत किया जाता है। 1990 से 2010 के बीच अमेरिकी सरकार ने इस प्रकार के कार्यक्रमों पर लगभग 1.5 बिलियन डॉलर से अधिक खर्च किए, लेकिन Kirby (2008) एवं अन्य वैज्ञानिक अध्ययनों से सिद्ध हुआ कि इन कार्यक्रमों से किशोर गर्भधारण दर या यौन व्यवहार में कोई महत्वपूर्ण कमी नहीं आई तथा कई मामलों में युवाओं में भ्रांतियां बढ़ीं। वहीं, कैलिफोर्निया, न्यूयॉर्क जैसे प्रगतिशील राज्यों में UNESCO/WHO के समान व्यापक मॉडल अपनाया जाता है, जहाँ परिणाम काफी बेहतर हैं। कुल मिलाकर अमेरिका में किशोर गर्भधारण दर 15-30 प्रति 1000 के बीच रहती है, जो यूरोपीय देशों से 4-5 गुना अधिक है, जो इस मॉडल की सीमाओं को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
एशिया-प्रशांत क्षेत्र एवं विकासशील देशों में यौन शिक्षा के मॉडल सांस्कृतिक, धार्मिक एवं सामाजिक संवेदनशीलताओं के कारण अधिक चुनौतीपूर्ण एवं जटिल हैं। मलेशिया एवं इंडोनेशिया जैसे देशों में धार्मिक मूल्यों के साथ संतुलित व्यापक यौन शिक्षा लागू की जा रही है, जबकि भारत में राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK) के अंतर्गत यौन शिक्षा के तत्व मौजूद हैं, लेकिन कार्यान्वयन असमान एवं सीमित है। लाओ पीडीआर, मंगोलिया एवं कुछ अफ्रीकी देशों में UNESCO समर्थित कार्यक्रमों ने ग्रामीण एवं हाशिए पर रहने वाले युवाओं तक पहुंच बनाई है, जिससे किशोर स्वास्थ्य संकेतकों में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है।
वैश्विक स्तर पर सबसे प्रभावी एवं सफल मॉडल वह है जो आयु-अनुरूप, प्रमाण-आधारित, मानवाधिकार-केंद्रित, सकारात्मक दृष्टिकोण वाला, सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील एवं समुदाय-आधारित हो। नीदरलैंड्स, स्वीडन, डेनमार्क जैसे देश इसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं, जहां यौन शिक्षा को डर या शर्म से नहीं, बल्कि सम्मान, जिम्मेदारी, सुख, सुरक्षा, भावनात्मक स्वास्थ्य एवं मानवीय विकास के हिस्से के रूप में देखा जाता है। UNESCO के 2018 फ्रेमवर्क को अब 85% से अधिक देशों ने अपनी नीतियों में कम से कम आंशिक रूप से शामिल किया है, लेकिन कार्यान्वयन में अभी भी शिक्षकों का प्रशिक्षण, माता-पिता की भागीदारी, संसाधनों की उपलब्धता, सामाजिक स्वीकृति एवं निरंतर मूल्यांकन जैसी गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं। विकासशील एवं सांस्कृतिक रूप से विविध देशों के लिए यह मॉडल अनुकूलित (adapted) रूप में अपनाया जा सकता है, ताकि स्थानीय मूल्यों एवं परंपराओं का सम्मान करते हुए युवाओं को सही, वैज्ञानिक, सम्मानजनक एवं जीवन-उपयोगी जानकारी प्रदान की जा सके।
अंत में, यौन शिक्षा का सबसे सफल वैश्विक मॉडल वह है जो यौनता को नकारात्मक, जोखिमपूर्ण या छिपाने योग्य विषय के रूप में नहीं, बल्कि एक सकारात्मक, सामान्य, सम्मानजनक एवं मानव जीवन के अभिन्न अंग के रूप में प्रस्तुत करता है। ऐसे मॉडल न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य, संबंधों की गुणवत्ता एवं युवाओं की भावनात्मक परिपक्वता को बेहतर बनाते हैं, बल्कि लिंग समानता, हिंसा की रोकथाम, परिवार नियोजन, यौन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच एवं सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने में भी निर्णायक योगदान देते हैं, जिससे एक स्वस्थ, समान एवं जिम्मेदार समाज का निर्माण संभव हो पाता है।
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