भारत में यौन शिक्षा की चुनौतियाँ: एक विचारणीय गहन शोध-आधारित विश्लेषण

भारत में यौन शिक्षा (sexuality education) का विषय आज भी एक अत्यंत संवेदनशील, विवादास्पद एवं जटिल मुद्दा बना हुआ है, क्योंकि यहाँ की गहरी जड़ें वाली सांस्कृतिक परंपराएँ, धार्मिक मान्यताएँ, सामाजिक रूढ़िवादिता तथा पारिवारिक मूल्य यौन एवं कामुकता (sexuality) से संबंधित खुले संवाद को व्यापक रूप से वर्जित एवं अनुचित मानते हैं। भारतीय समाज में यौन प्रकृति के विषयों की सार्वजनिक चर्चा को लंबे समय से एक गहरे वर्जना (taboo) के रूप में देखा जाता रहा है, जिसके कारण स्कूलों, कॉलेजों तथा सामुदायिक स्तर पर प्रभावी, वैज्ञानिक एवं व्यापक यौन शिक्षा (Comprehensive Sexuality Education - CSE) लागू करना अत्यंत कठिन सिद्ध हो रहा है। इस स्थिति में युवाओं, विशेषकर किशोरों एवं किशोरियों को सही, आयु-सम्मत एवं धार्मिक, तांत्रिक, वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त करने में भारी बाधाएँ आती हैं, जिसके परिणामस्वरूप मिथकों, भ्रांतियों, अनचाहे गर्भधारण, यौन संचारित संक्रमणों (STI/HIV), यौन शोषण, लिंग आधारित हिंसा तथा असुरक्षित यौन व्यवहार जैसी गंभीर समस्याएँ लगातार बढ़ती जा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी 2024-2025 में कई बार इस मुद्दे पर गंभीर टिप्पणियाँ की हैं, जिसमें कहा गया कि यौन शिक्षा की कमी युवाओं में जागरूकता के अभाव को जन्म दे रही है, जो किशोरों के स्वास्थ्य, सुरक्षा एवं समानता से जुड़े मुद्दों को और गंभीर बना रही है, फिर भी सामाजिक एवं राजनीतिक स्तर पर इसका व्यापक विरोध एवं प्रतिरोध बना हुआ है।

भारत में यौन शिक्षा की सबसे बड़ी एवं मूलभूत चुनौती गहरी जड़ें वाली सांस्कृतिक एवं सामाजिक वर्जनाएँ (cultural taboos) हैं, जो यौन एवं कामुकता से संबंधित किसी भी प्रकार के खुले संवाद को अनैतिक, अश्लील या पारंपरिक भारतीय मूल्यों के विरुद्ध मानती हैं। बहुत से लोग, विशेषकर ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में, यह मानते हैं कि यौन शिक्षा बच्चों की मासूमियत को भ्रष्ट कर देगी, उन्हें समय से पहले यौन व्यवहार की ओर प्रेरित करेगी या पश्चिमी विचारधारा को बढ़ावा देगी। इस धारणा के कारण ही कई राज्य सरकारें, जैसे गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ ने अतीत में स्कूलों में यौन शिक्षा कार्यक्रमों को पूर्णतः प्रतिबंधित या निलंबित कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी 2024 में इस आम धारणा को संबोधित करते हुए कहा कि यौन शिक्षा को "पश्चिमी अवधारणा" मानना एक बड़ा भ्रम है, जो विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा स्कूलों में ऐसे कार्यक्रम लागू करने में प्रतिरोध का मुख्य कारण बना हुआ है। यह वर्जना इतनी गहरी है कि माता-पिता, शिक्षक एवं समुदाय के सदस्य अक्सर यौन शिक्षा को "अनैतिक" या "संकीर्णता बढ़ाने वाला" मानकर इसका विरोध करते हैं, जिससे युवा इंटरनेट, साथियों या अनौपचारिक स्रोतों से प्राप्त गलत, अधूरी या विकृत जानकारी पर निर्भर हो जाते हैं।
कार्यान्वयन स्तर पर दूसरी बड़ी चुनौती प्रशासनिक एवं नीतिगत असंगतियाँ (administrative & policy inconsistencies) हैं। भारत में यौन शिक्षा मुख्य रूप से "लाइफ स्किल्स एजुकेशन" या "एडोलसेंट एजुकेशन प्रोग्राम" (AEP) के अंतर्गत दी जाती है, लेकिन इसे कभी भी स्पष्ट रूप से "यौन शिक्षा" के रूप में नामित नहीं किया जाता। राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK - 2014) एवं समग्र शिक्षा अभियान जैसे कार्यक्रमों में यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य (SRH) के कुछ तत्व शामिल हैं, लेकिन पूर्ण रूप से व्यापक यौन शिक्षा (CSE) का अभाव है। कई राज्यों में कार्यक्रमों को लागू करने में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, स्थानीय स्तर पर विरोध तथा संसाधनों का अभाव प्रमुख बाधाएँ बनता है। उदाहरण के लिए, 2007 में AEP कार्यक्रम को रूढ़िवादी विरोध के कारण कई राज्यों में निलंबित कर दिया गया था, और आज भी शिक्षकों का प्रशिक्षण अपर्याप्त, पाठ्यक्रम अस्पष्ट एवं निगरानी व्यवस्था कमजोर है। UNESCO एवं UNFPA के अनुसार, भारत में CSE का कवरेज बहुत कम है, जिसमें केवल एक तिहाई से संकोच (lack of training & discomfort) भी एक गंभीर चुनौती है। अधिकांश शिक्षक यौन एवं कामुकता से संबंधित विषयों पर खुलकर बात करने में असहज महसूस करते हैं, क्योंकि उन्हें न तो पर्याप्त प्रशिक्षण मिला है और न ही सांस्कृतिक रूप से यह विषय उनके लिए सहज है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि शिक्षक अक्सर केवल जैविक पहलुओं (reproduction) तक सीमित रहते हैं तथा सहमति, लिंग विविधता, भावनात्मक संबंध या यौन सुख जैसे महत्वपूर्ण विषयों को छोड़ देते हैं। अभिभावकों में भी यौन शिक्षा को "बच्चों को बिगाड़ने" वाली चीज के रूप में देखने की धारणा प्रबल है, जिसके कारण वे स्कूलों में ऐसे कार्यक्रमों का विरोध करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में भी इस बात पर जोर दिया कि यौन शिक्षा की कमी के कारण युवाओं में जागरूकता का अभाव है, जो किशोरों के स्वास्थ्य, सुरक्षा एवं समानता से जुड़े मुद्दों को बढ़ावा दे रहा है।
इंटरनेट एवं गलत सूचना (misinformation) का प्रसार भी एक नई एवं गंभीर चुनौती बनकर उभरा है। युवा आज अधिकांश जानकारी इंटरनेट, सोशल मीडिया या पोर्नोग्राफी से प्राप्त करते हैं, जो अक्सर विकृत, अवास्तविक एवं असुरक्षित होती है। सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि इंटरनेट पर गलत सूचना एवं समस्याग्रस्त यौन व्यवहार के कारण युवाओं में भ्रांतियाँ बढ़ रही हैं, और इसके समाधान के लिए व्यापक यौन शिक्षा अनिवार्य है। ग्रामीण एवं हाशिए पर रहने वाले युवाओं युवतियों में स्वास्थ्य सेवाओं (जैसे Adolescent Friendly Health Clinics) तक पहुँच की कमी तथा गोपनीयता का अभाव भी एक बड़ी बाधा है।
लिंग, जाति एवं सामाजिक असमानताएँ भी यौन शिक्षा की चुनौतियों को और जटिल बनाती हैं। लड़कियों एवं LGBTQ+ युवाओं के लिए यौन शिक्षा की आवश्यकताएँ एवं अनुभव अलग-अलग होते हैं, लेकिन वर्तमान पाठ्यक्रमों में इनका समावेश बहुत कम है। जातिगत एवं लिंग आधारित रूढ़ियाँ यौन शिक्षा को प्रभावित करती हैं, जिससे हाशिए पर रहने वाले समूहों में जानकारी का अभाव और भी गंभीर हो जाता है।
अंत में, भारत में यौन शिक्षा की चुनौतियाँ बहुआयामी हैं — सांस्कृतिक वर्जनाएँ, नीतिगत असंगतियाँ, प्रशिक्षण की कमी, सामाजिक विरोध, गलत सूचना का प्रसार एवं संसाधनों की कमी। इन चुनौतियों के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ, UNESCO/WHO के दिशानिर्देश तथा कुछ सफल स्थानीय कार्यक्रम (जैसे झारखंड का उड़ान) से स्पष्ट है कि सही दिशा में प्रयास एवं सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील दृष्टिकोण से व्यापक यौन शिक्षा लागू करना संभव है। इसके लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, शिक्षकों का प्रशिक्षण, अभिभावकों एवं समुदाय की भागीदारी तथा वैज्ञानिक एवं सम्मानजनक पाठ्यक्रम की आवश्यकता है, ताकि युवा सुरक्षित, जागरूक एवं जिम्मेदार बन सकें। और भी सुस्पष्ट विस्तृत जानकारी के गूगल सर्च से amitsrivastav.in वेबसाइट्स पर मनपसंद लेख खोजें पढ़ें यहां मिलती है शोध आधारित महत्वपूर्ण उपयोगी जानकारी।


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