सरकारी तंत्र का गोलमाल: निष्क्रिय खातों की कहानी या सक्रिय लूट का खेल?
आज के डिजिटल युग में जब हर चीज़ “स्मार्ट” हो चुकी है—फोन स्मार्ट, शहर स्मार्ट, बैंकिंग स्मार्ट—तब एक आम नागरिक का खाता “निष्क्रिय” कैसे हो जाता है, यह अपने आप में एक बड़ा रहस्य है। मोबाइल पर एक सीधा-सादा सा मैसेज आता है—“आपका खाता निष्क्रिय हो गया है, जल्दी केवाईसी कराइए, नहीं तो पैसा आरबीआई के डीईए फंड में चला जाएगा।” सुनने में यह सूचना लगती है, लेकिन गहराई में जाइए तो यह सूचना नहीं, एक व्यवस्था का ऐसा चेहरा है जो धीरे-धीरे आम आदमी की जेब पर हाथ साफ कर रहा है। यह वही सिस्टम है जो कहता है कि “आपका पैसा आपका है”, लेकिन साथ में एक छोटा सा Terms & Conditions Apply जोड़ देता है—“जब तक आप हमारी शर्तों पर चलते रहें।”
पहली नजर में यह मैसेज एक चेतावनी लगता है, लेकिन असल में यह उस सरकारी तंत्र का आईना है जो नागरिकों को नियमों के जाल में उलझाकर उनकी मेहनत की कमाई पर धीरे-धीरे अधिकार जमा रहा है। सवाल यह है कि अगर खाता “निष्क्रिय” हो गया, तो क्या बैंक ने कभी ग्राहक को सक्रिय करने की कोशिश की? क्या उन्होंने फोन किया, पत्र भेजा, या किसी अधिकारी को जिम्मेदारी दी? नहीं। लेकिन जैसे ही पैसा DEA फंड में ट्रांसफर करने की बारी आती है, पूरा सिस्टम अचानक सक्रिय हो जाता है—जैसे कोई भूखा शेर अपने शिकार की गंध पा गया हो।
सरकारी तंत्र का गोलमाल
यह DEA फंड आखिर है क्या? एक ऐसा खजाना जहां देशभर के निष्क्रिय खातों का पैसा जमा होता है। नाम बड़ा प्यारा है—“Depositor Education and Awareness Fund”—यानी जमाकर्ताओं की शिक्षा और जागरूकता के लिए फंड। लेकिन सवाल उठता है कि क्या इस फंड से वास्तव में कोई जागरूकता अभियान चलता है? क्या गांव-गांव जाकर लोगों को बताया जाता है कि “भाई, अपना खाता चालू रखो वरना पैसा गायब हो जाएगा”? या फिर यह सिर्फ एक सरकारी गुल्लक है जिसमें आम जनता का पैसा डालकर उसे भूल जाने की उम्मीद की जाती है? चिटफंड बैकों मे जमा जनता की सब गाड़ी गड़ाई पूंजी तो सरकार चिटफंड बैंक संचालकों से शायद मिलजुल कर हडप ही गयी अब नेशनल बैंकों में भी छोटे-छोटे बचत खाता संचालकों का पूंजी हडपने का सब नियम बनते जा रहे हैं।
व्यंग्य की बात यह है कि जब आम आदमी अपने ही पैसे को निकालने जाता है, तो उससे इतने सवाल पूछे जाते हैं जैसे वह कोई अपराधी हो। “आधार लाओ, पैन लाओ, पासबुक अपडेट कराओ, KYC कराओ, फोटो लाओ, गारंटर लाओ।” लेकिन जब उसी आदमी का खाता निष्क्रिय घोषित करना होता है, तब कोई सवाल नहीं—बस एक मैसेज और काम खत्म। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई दुकानदार ग्राहक से पैसे लेते वक्त मुस्कुराता है, लेकिन जब वही ग्राहक सामान लौटाने आता है, तो सौ बहाने बना देता है।
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे दिलचस्प भूमिका निभाता है “नियम”। नियम ऐसे बनाए गए हैं कि आम आदमी समझ ही न पाए कि हो क्या रहा है। RBI कहता है कि अगर 10 साल तक खाता निष्क्रिय रहा तो पैसा DEA फंड में चला जाएगा। अब एक गरीब मजदूर, जो रोज़ की कमाई से जीवन चलाता है, क्या उसे हर महीने बैंक जाकर यह चेक करना चाहिए कि उसका खाता सक्रिय है या नहीं? और अगर वह नहीं कर पाया, तो क्या उसकी गलती इतनी बड़ी है कि उसका पैसा उससे छीन लिया जाए?
राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो यह सिर्फ बैंकिंग का मुद्दा नहीं है, यह उस सोच का हिस्सा है जिसमें सरकार और संस्थाएं नागरिक को “ग्राहक” नहीं, बल्कि “डेटा और पैसा” मानने लगी हैं। हर योजना, हर नियम, हर प्रक्रिया में एक छुपा हुआ उद्देश्य होता है—कैसे ज्यादा से ज्यादा पैसा सिस्टम में रोका जाए, और कम से कम वापस किया जाए। यह वही देश है जहां चुनाव के समय नेता कहते हैं—“हम आपके सेवक हैं।” लेकिन चुनाव खत्म होते ही वही सेवक मालिक बन जाते हैं, और नागरिक को अपने ही पैसे के लिए लाइन में खड़ा होना पड़ता है।
अगर आप इस मैसेज को ध्यान से पढ़ें, तो उसमें एक छुपा हुआ डर है—“जल्दी करो, नहीं तो पैसा चला जाएगा।” यह डर ही इस सिस्टम का सबसे बड़ा हथियार है। डर के सहारे लोगों को बैंक की शाखाओं में धकेला जाता है, जहां वे घंटों लाइन में खड़े रहते हैं, सिर्फ इसलिए कि उनका पैसा “सुरक्षित” रहे। लेकिन सच्चाई यह है कि यह सुरक्षा नहीं, एक तरह का नियंत्रण है—आपकी मेहनत की कमाई पर, आपके समय पर, और आपकी आज़ादी पर।
यह पूरा खेल सिर्फ निष्क्रिय खातों तक सीमित नहीं है। कभी न्यूनतम बैलेंस का नियम, कभी चार्जेस का जाल, कभी OTP की समस्या—हर जगह एक ऐसा सिस्टम खड़ा किया गया है जो आम आदमी को हमेशा असुविधा में रखता है। और जब वह परेशान होकर सवाल पूछता है, तो उसे एक ही जवाब मिलता है—“सर, यह RBI का नियम है।” यानी जिम्मेदारी से बचने का सबसे आसान तरीका—ऊपर का नाम ले लो।
व्यंग्य की चरम स्थिति तब आती है जब हम देखते हैं कि बड़े-बड़े कॉरपोरेट्स का हजारों करोड़ का कर्ज माफ हो जाता है, लेकिन एक आम आदमी का खाता निष्क्रिय होने पर उसका पैसा “नियमों” के तहत जब्त कर लिया जाता है। यह वही दोहरा मापदंड है जो इस सिस्टम की असली पहचान है—एक तरफ अमीरों के लिए रियायत, दूसरी तरफ गरीबों के लिए सख्ती।
सोचिए, अगर यही नियम नेताओं पर लागू हो जाएं—अगर 5 साल तक उन्होंने जनता के लिए काम नहीं किया, तो उनकी सैलरी DEA फंड में चली जाए—तो क्या होगा? शायद तब हर नेता हर महीने जनता से मिलने लगे, हर समस्या का समाधान तुरंत होने लगे। लेकिन ऐसा होगा नहीं, क्योंकि नियम हमेशा नीचे वालों के लिए बनते हैं, ऊपर वालों के लिए नहीं।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा नुकसान उस विश्वास का होता है जो एक नागरिक अपने देश की संस्थाओं पर करता है। जब बार-बार ऐसे अनुभव होते हैं, तो वह विश्वास धीरे-धीरे खत्म होने लगता है। और जब विश्वास खत्म हो जाता है, तो लोकतंत्र सिर्फ एक कागजी व्यवस्था बनकर रह जाता है—जहां चुनाव होते हैं, सरकार बनती है, लेकिन आम आदमी की जिंदगी में कुछ नहीं बदलता।
यह लेख सिर्फ एक मैसेज की कहानी नहीं है, यह उस मानसिकता की कहानी है जिसमें सिस्टम अपने नागरिकों को “सुविधा” नहीं, “संघर्ष” देता है। जहां हर कदम पर आपको यह साबित करना पड़ता है कि आप सही हैं, आपका पैसा सही है, और आपका अस्तित्व सही है। और इस सबके बीच कहीं न कहीं यह सवाल गूंजता रहता है—क्या यह वही आज़ादी है जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने संघर्ष किया था?
अंत में यही कहा जा सकता है कि यह “गोलमाल” सिर्फ बैंकिंग का नहीं है, यह पूरे सिस्टम का है। और जब तक आम आदमी इस गोलमाल को समझेगा नहीं, तब तक यह खेल चलता रहेगा—कभी निष्क्रिय खाते के नाम पर, कभी किसी और नियम के नाम पर। इसलिए अगली बार जब आपके फोन पर ऐसा मैसेज आए, तो सिर्फ बैंक न जाएं—थोड़ा सोचें भी कि यह सिस्टम आखिर किसके लिए काम कर रहा है, और किसके खिलाफ।
क्योंकि भाई, यह सिर्फ गोलमाल नहीं है—यह एक सुनियोजित गोलमाल है।